UGC के नये नियमो पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक,
सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज को जातियों से मुक्त नहीं कर सके हैं, अब क्या इस नए कानून से हम और पीछे की ओर जा रहे हैं? अदालत ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगा दी है,
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को यूजीसी के नए भेदभाव विरोधी नियमों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई हुई,सुप्रीम कोर्ट में आज यूजीसी के नए भेदभाव विरोधी नियमों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई हुई. चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमाल्या बागची की बेंच के सामने याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि नियमों का सेक्शन 3C जाति आधारित भेदभाव को केवल एससी, एसटी और ओबीसी तक सीमित करता है और सामान्य वर्ग को बाहर रखता है. यह अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि यह परिभाषा संविधान की भावना और सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों के विपरीत है तथा इससे समाज में वैमनस्य बढ़ेगा.
सुनवाई के दौरान रैगिंग से जुड़े संभावित दुरुपयोग का मुद्दा भी उठाया गया, जिस पर अदालत ने सवाल किए. चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि आजादी के 75 साल बाद भी समाज जाति से मुक्त नहीं हो सका है और यह सोचना होगा कि क्या नए नियम हमें और पीछे ले जा रहे हैं.
जस्टिस बागची ने सामाजिक न्याय से जुड़े कानूनों में संतुलन और सुरक्षा उपायों की जरूरत पर जोर दिया. याचिकाकर्ताओं ने यूजीसी के नियमों पर रोक लगाने और उन्हें रद्द करने की मांग की, जबकि अदालत ने संकेत दिया कि इस मुद्दे पर कानून विशेषज्ञों की एक समिति द्वारा विचार किया जाना चाहिए
चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि यूजीसी के वर्ष 2012 के नियम अगले आदेश तक लागू रहेंगे और नए यूजीसी इक्विटी गाइडलाइंस पर रोक लगाई जाती है. कोर्ट ने कहा कि यह मामला अब 19 मार्च को सुना जाएगा और उस दिन रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की ओर से दायर याचिकाओं के साथ इसे जोड़ा जाएगा. चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि उन याचिकाओं में उठाए गए मुद्दों और पहले से पारित आदेशों का इस मामले पर भी असर पड़ेगा. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है. कोर्ट ने कहा कि नए दिशानिर्देशों में समाज को बांटने की क्षमता है और इनका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए न्यायालय का हस्तक्षेप जरूरी है. अदालत ने दोहराया कि फिलहाल 2012 के यूजीसी दिशानिर्देश ही प्रभावी रहेंगे और नए नियमों पर रोक जारी रहेगी, जबकि पूरे मामले की विस्तृत सुनवाई मार्च में की जाएगी,
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये नियम प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि नियमों की भाषा साफ नहीं है, इसलिए विशेषज्ञों की जरूरत है जो इसे स्पष्ट करें. कोर्ट ने यह भी कहा कि देश को जातिविहीन समाज की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन साथ ही जिन लोगों पर वास्तविक रूप से भेदभाव का असर पड़ता है, उनके संरक्षण के लिए प्रभावी तंत्र भी होना चाहिए. जस्टिस ज्योमाल्या बागची ने कहा कि भारत की एकता और समावेशिता का भाव शैक्षणिक संस्थानों में दिखाई देना चाहिए. कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि इन नियमों का इस्तेमाल शरारती तत्वों द्वारा गलत तरीके से नहीं होना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालय, स्कूल और कॉलेज समाज से अलग-थलग नहीं हो सकते, क्योंकि अगर कैंपस के भीतर ऐसा माहौल बनेगा तो उसका असर समाज के बाहर के व्यवहार पर भी पड़ेगासुप्रीम कोर्ट ने UGC के ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026’ को अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाला बताया और स्थगित कर दिया, चीफ जस्टिस सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि इस नियम को स्पष्ट करने की जरूरत है,तब तक 2012 के पुराने UGC नियम लागू रहेंगे. कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया,इस मामले में अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी.सुप्रीम कोर्ट ने UGC 2026 इक्विटी रेगुलेशन पर सुनवाई करते हुए कड़ी टिप्पणियां कीं और सवाल उठाया कि क्या भारत 75 साल की संवैधानिक प्रगति के बावजूद जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने के बजाय पिछड़ेपन की दिशा में जा रहा है,
सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज को जातियों से मुक्त नहीं कर सके हैं, अब क्या इस नए कानून से हम और पीछे की ओर जा रहे हैं? अदालत ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगा दी है,