बॉम्बे हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ‘नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है, विरोध करने पर केस दर्ज किए जाते हैं,
कोई नागरिक केंद्र सरकार के कुछ फ़ैसलों का विरोध कर रहा है और उसके ख़िलाफ़ नारे लगा रहा है, उसे किसी इलाके से बाहर निकालने (एक्सटर्नमेंट) का आधार नहीं बनाया जा सकता। [2026 LiveLaw (Bom) 305]
सिंगल-जज जस्टिस माधव जामदार ने मुंबई पुलिस द्वारा सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी (49) के ख़िलाफ़ एक्सटर्नमेंट ऑर्डर जारी करने पर कड़ी नाराज़गी जताई। सईद ‘सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया’ (SDPI) के जनरल सेक्रेटरी हैं और केंद्र सरकार के कई फ़ैसलों—जिनमें नागरिकता कानून में संशोधन और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद शामिल हैं—के ख़िलाफ़ सक्रिय रूप से मोर्चे और धरने आयोजित कर रहे थे।
याचिका देखने के बाद जज ने जानना चाहा कि सईद को एक साल के लिए शहर से बाहर निकालने का आदेश किन आधारों पर दिया गया, जबकि उनके ख़िलाफ़ दर्ज पाँच FIR में से ज़्यादातर भारत सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करने से जुड़ी थीं। जस्टिस जामदार ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, “यह क्या है? सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है… वे विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकते, वे आंदोलन नहीं कर सकते—यह सब क्या है? अब इतने सारे पेपर लीक हो गए हैं। अगर लोग विरोध करते हैं, तो आप केस दर्ज कर देंगे… यह क्या है? विरोध करना नागरिकों का अधिकार है… याचिकाकर्ता ने बस ‘बीजेपी सरकार मुर्दाबाद’, ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाए हैं… नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? ऐसे नारों के लिए एक्सटर्नमेंट ऑर्डर क्यों?”
जज ने आगे मौखिक रूप से कहा कि पुलिस नागरिकों को सिर्फ़ इसलिए शहर से बाहर नहीं निकाल सकती क्योंकि उन्होंने सरकार के फ़ैसलों का विरोध किया। जस्टिस जामदार ने मौखिक रूप से कहा, “पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है, वे लोक सेवक हैं… मैं आपके अधिकारियों पर भारी जुर्माना लगाने जा रहा हूँ…” जस्टिस जामदार ने महाराष्ट्र के राजनीतिक माहौल में चल रही “हॉर्स-ट्रेडिंग” (विधायकों/सांसदों की खरीद-फरोख्त) पर भी टिप्पणी की, जिसमें सांसद (MP) और विधायक (MLA) पार्टियाँ बदल रहे हैं। यह टिप्पणी तब आई जब जज ने देखा कि सईद SDPI नाम की एक राजनीतिक पार्टी से जुड़े हैं।
जस्टिस जामदार ने आदेश में लिखवाया, “याचिकाकर्ता ने अपनी हैसियत से भारत सरकार द्वारा लिए गए कुछ फैसलों के खिलाफ मोर्चे और धरने आयोजित किए। यह महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति को शहर से बाहर निकालने का आधार नहीं हो सकता। की गई कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण है। इसलिए, शहर से बाहर निकालने के आदेश को रद्द करते हुए याचिका का निपटारा किया जाता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के अनुसार, नागरिकों को न केवल अपनी राय व्यक्त करने की स्वतंत्रता है, बल्कि सम्मान के साथ जीने की भी स्वतंत्रता है। भारत सरकार के कुछ फैसलों का विरोध करने के लिए प्रतिवादियों द्वारा याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई कार्रवाई उसके मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है।” इसके साथ ही बेंच ने याचिका का निपटारा कर दिया और डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (जोन 6) और डिविजनल कमिश्नर, कोंकण डिवीजन द्वारा क्रमशः 3 दिसंबर, 2025 और 27 मार्च, 2026 को पारित आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके तहत सईद को एक साल के लिए शहर से बाहर निकाला गया।
कोई नागरिक केंद्र सरकार के कुछ फ़ैसलों का विरोध कर रहा है और उसके ख़िलाफ़ नारे लगा रहा है, उसे किसी इलाके से बाहर निकालने (एक्सटर्नमेंट) का आधार नहीं बनाया जा सकता। [2026 LiveLaw (Bom) 305]