सुप्रीमकोर्ट न्यायाधीश के सामने ही केस फाइल उछाल मुख्य न्यायाधीश के लिए अधिवक्ता ने की अभद्र टिप्पड़ी,
सुप्रीमकोर्ट न्यायाधीश ने मानवीय उदाहरण पेश कर कोई भी दंड न देने का लिया निर्णय,
लखनऊ के एडवोकेट प्रबल प्रताप
पिटीशनर-इन-पर्सन ने सुप्रीम कोर्ट रूम में जजों को ‘ज्यूडिशियल सर्वेंट’ अर्थात न्यायिक नौकर/सेवक कहा और केस फाइल हवा में उछाल दी,
और मुख्य न्यायाधीश के लिए
अभद्र भाषा का प्रयोग किया
सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत उन्हें बाहर निकाल दिया
हुआ यूं कि
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
और जस्टिस अलोक अराधे की बेंच के सामने
प्रबल प्रताप खुद अपनी पैरवी कर रहा था
उसने खुद को संप्रभु बताया और जजों से कहा:
“Mr. Judicial servant,
I order you to order
the registration of FIR against
ACP विकास नगर, लखनऊ”
जस्टिस विश्वनाथन ने हैरानी से पूछा,
“You are ordering us?”
इसके बाद पिटीशनर ने
CJI के खिलाफ गाली-गलौज की
और केस के कागजात जजों की तरफ फेंकते हुए
गाली दी और कहा: “यह दे देना CJI को”
काका: ऐसे व्यवहार को
contempt of court माना जाता है
जजों को ‘नौकर’ कहना
और कोर्ट में फाइल फेंकना गंभीर अवमानना का मामला है,
जिसमें 6 महीने तक की सजा और जुर्माना हो सकता
लेकिन जस्टिस विश्वनाथन ने कहा
कि पिटीशनर मानसिक रूप से परेशान दिख रहे हैं,
इसलिए कोर्ट उनके खिलाफ
कोई contempt of court की कार्रवाई
या कोई और एक्शन नहीं लेगी
कोर्ट ने सहानुभूति दिखाई…
#BriefoftheCase
ऐसी नौबत इसलिए आई की एक याचिकाकर्ता का कहना है कि उसने साइबर अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने को पुलिस को तहरीर दिया लेकिन प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई ,फिर माननीय न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में धारा 175(3) भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता के तहत साइबर अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज व अन्वेषण कराने को प्रार्थना पत्र योजित किया।किन्तु प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज तथा अन्वेषण कराने के बजाय उक्त प्रकरण को एक निजी परिवाद के तौर पर दर्ज करने का आलौच्य आदेश पारित कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने पारित आदेश से क्षुब्ध हो कर सत्र न्यायालय से उच्च न्यायालय तक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज तथा अन्वेषण कराने को सफर किया परन्तु न्याय मिलने की आश में निराशा ही मिली है।
आखिर माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर कर के माननीय न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय, सत्र न्यायालय व उच्च न्यायालय के निर्णय से व्यथित होने से अपना आपा खो कर उग्र हो गया, और माननीय न्यायमूर्थियों के साथ अभद्र व्यवहार कर बैठा ।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की उक्त परेशानी को देकर याचिकाकर्ता के खिलाफ सहानुभूतिपूर्वक कोई कानूनी कार्रवाई न करने का निर्णय लिया किन्तु याचिकाकर्ता की विशेष अनुमति याचिका को भी अंततोगत्वा खारिज कर दिया ।
याचिकाकर्ता के उग्र तथा अभद्र व्यवहार के खिलाफ भले सख्त कानूनी कार्रवाई की जाती, परन्तु याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज के बजाय स्वीकार कर के प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज तथा अन्वेषण करवाया जाना चाहिए था क्योंकि याचिकाकर्ता जिस कारण काफी व्यथित था उस को न्याय मिल जाता।
लखनऊ के Advocate प्रबल प्रताप
पिटीशनर-इन-पर्सन ने सुप्रीम कोर्ट रूम में
जजों को ‘ज्यूडिशियल सर्वेंट’
अर्थात न्यायिक नौकर/सेवक कहा
और केस फाइल हवा में उछाल दी
और मुख्य न्यायाधीश के लिए
अभद्र भाषा का प्रयोग किया
सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत उन्हें बाहर निकाल दिया
हुआ यूं कि
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
और जस्टिस अलोक अराधे की बेंच के सामने
प्रबल प्रताप खुद अपनी पैरवी कर रहा था
उसने खुद को संप्रभु बताया और जजों से कहा:
“Mr. Judicial servant,
I order you to order
the registration of FIR against
ACP विकास नगर, लखनऊ”
जस्टिस विश्वनाथन ने हैरानी से पूछा,
“You are ordering us?”
इसके बाद पिटीशनर ने
CJI के खिलाफ गाली-गलौज की
और केस के कागजात जजों की तरफ फेंकते हुए
गाली दी और कहा: “यह दे देना CJI को”
काका: ऐसे व्यवहार को
contempt of court माना जाता है
जजों को ‘नौकर’ कहना
और कोर्ट में फाइल फेंकना गंभीर अवमानना का मामला है,
जिसमें 6 महीने तक की सजा और जुर्माना हो सकता
लेकिन जस्टिस विश्वनाथन ने कहा
कि पिटीशनर मानसिक रूप से परेशान दिख रहे हैं,
इसलिए कोर्ट उनके खिलाफ
कोई contempt of court की कार्रवाई
या कोई और एक्शन नहीं लेगी
कोर्ट ने सहानुभूति दिखाई…
#BriefoftheCase
ऐसी नौबत इसलिए आई की एक याचिकाकर्ता का कहना है कि उसने साइबर अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने को पुलिस को तहरीर दिया लेकिन प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई ,फिर माननीय न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में धारा 175(3) भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता के तहत साइबर अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज व अन्वेषण कराने को प्रार्थना पत्र योजित किया।किन्तु प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज तथा अन्वेषण कराने के बजाय उक्त प्रकरण को एक निजी परिवाद के तौर पर दर्ज करने का आलौच्य आदेश पारित कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने पारित आदेश से क्षुब्ध हो कर सत्र न्यायालय से उच्च न्यायालय तक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज तथा अन्वेषण कराने को सफर किया परन्तु न्याय मिलने की आश में निराशा ही मिली है।
आखिर माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर कर के माननीय न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय, सत्र न्यायालय व उच्च न्यायालय के निर्णय से व्यथित होने से अपना आपा खो कर उग्र हो गया, और माननीय न्यायमूर्थियों के साथ अभद्र व्यवहार कर बैठा ।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की उक्त परेशानी को देकर याचिकाकर्ता के खिलाफ सहानुभूतिपूर्वक कोई कानूनी कार्रवाई न करने का निर्णय लिया किन्तु याचिकाकर्ता की विशेष अनुमति याचिका को भी अंततोगत्वा खारिज कर दिया ।
याचिकाकर्ता के उग्र तथा अभद्र व्यवहार के खिलाफ भले सख्त कानूनी कार्रवाई की जाती, परन्तु याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज के बजाय स्वीकार कर के प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज तथा अन्वेषण करवाया जाना चाहिए था क्योंकि याचिकाकर्ता जिस कारण काफी व्यथित था उस को न्याय मिल जाता।
देखा जाय तो प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज व अन्वेषण कराने में सब को हमेशा परेशानी रहती है, जबकि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज व अन्वेषण करने में किसी को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
अगर प्रथम सूचना रिपोर्ट, अन्वेषण तथा विचारण में झूठी पायी जाती तो भी तो झूठी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने को प्रथम सूचना रिपोर्ट कर्ता के खिलाफ कानून में दण्ड का प्रावधान है । #Shamsher_Yadav_Jagrana advocate
देखा जाय तो प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज व अन्वेषण कराने में सब को हमेशा परेशानी रहती है, जबकि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज व अन्वेषण करने में किसी को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।अगर प्रथम सूचना रिपोर्ट, अन्वेषण तथा विचारण में झूठी पायी जाती तो भी तो झूठी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने को प्रथम सूचना रिपोर्ट कर्ता के खिलाफ कानून में दण्ड का प्रावधान है,
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सुप्रीमकोर्ट न्यायाधीश ने मानवीय उदाहरण पेश कर कोई भी दंड न देने का लिया निर्णय,